अनुमति जरूरी है

मेरी अनुमति के बिना मेरे ब्लोग से कोई भी पोस्ट कहीं ना लगाई जाये और ना ही मेरे नाम और चित्र का प्रयोग किया जाये

my free copyright

MyFreeCopyright.com Registered & Protected

रविवार, 23 जुलाई 2017

मैं सन्नाटा बुन रही हूँ ...


मैं सन्नाटा बुन रही हूँ ...जाने कब से
न, न अकेलापन या एकांत नहीं है ये
और न ही है ये ख़ामोशी

तेरे शहर के सन्नाटे का एक फंद
मेरी रूह के सन्नाटे से जुड़ कर
बना रहा है तस्वीर-ए-यार

सुनो
तुम ओढ़ लेना
मैं पढ़ लूँगी जुबाँ
हो जायेगी बस गुफ्तगू
काफी है जीने के लिए

इश्क की प्यालियों का नमक है ये
जिसका क़र्ज़ कायनात के अंतिम छोर तक भी चुकता नहीं होता ...

रविवार, 16 जुलाई 2017

एक शाम ब्लॉगिंग के नाम .....

 
 
एक शाम ब्लॉगिंग के नाम ......जी हाँ, हम सबके प्रिय मित्र Mahfooz Ali द्वारा आयोजित ब्लॉगर मीट (ये वो वाला मीट नहीं है जनाब जो गौरक्षकों के हथियार निकल आयें और पेल दें सब पर दे दनादन, लेकिन अगर ऐसा हो भी जाता तो कोई डर नहीं था क्योंकि आयोजन करने वाला भी तो हमारा मोहम्मद अली था :) ) हाँ तो जब महफूज़ बुलाये और कोई न आये ऐसा तो हो ही नहीं सकता. जितने प्यार और सम्मान से महफूज़ बुलाता है उसके बाद अपनी तबियत को भी कहना पड़ता है ठीक हो जा वर्ना महफूज़ आ जायेगा :)

दोस्तों, एक अरसे बाद घर से अकेली निकली और जब अपने ब्लॉगिंग की दुनिया के दोस्तों से मिली तो एक अलग सी ख़ुशी मिली. कुछ नए लोगों से भी मिलना हुआ जो फेसबुक पर तो दोस्त हैं लेकिन अभी तक मिले नहीं थे. ब्लॉगिंग का दौर वो दौर था जिसमे जब बात होती थी तो पोस्ट पर होती थी लेकिन सम्बन्ध ज्यों के त्यों कायम रहते थे और ऐसी ही आत्मीयता आज तक बनी हुई है तभी तो एक बुलावे पर सब दौड़े चले गए. अंजू चौधरी, डॉ दराल, मुकेश कुमार सिन्हा, शाहनवाज़, डॉ दराल, तारकेश्वर गिरी, सुनीता शानू, वंदना गुप्ता, हितेश शर्मा, आलोक खरे, ब्रजभूषण खरे जिनका कल जन्मदिन भी था , संंजय जी जो एनएसडी से जुड़े अभिनेता मॉम, तलवार जैसी कई फिल्मों में अभिनय कर चुके हैं, उनका पिछली बार जब मिले थे जब जन्मदिन था, रमेश सिंह बिष्ट, शाहनवाज़, खुशदीप सहगल आदि बच्चों सी चपलता के साथ वहाँ मौजूद थे तो फोटो सेशन का भी खूब लाभ उठाया गया.

१ जुलाई से जब से एक बार फिर ब्लॉगिंग की तरफ सबने कदम बढाया तो लगा जैसे वो ही दौर लौट आएगा. कल की मीट में इन्ही बातों पर फोकस किया गया कि कैसे एक बार फिर लेखक को उसके ब्लॉग की तरफ मोड़ा जाए. कैसे अपने कंटेंट को आकर्षक बनाया जाए जो पाठक खुद ढूंढता हुआ आ जाये. कैसे आज ब्लॉगिंग से कमाई की जा सकती है उस के बारे में भी चर्चा की गयी. और सही बात है लेखक लिख रहा है तो चाहता है उसका लेखन सारे संसार तक पहुँचे मगर वो रास्ते नहीं जानता . इस मीटिंग में यही समझाने और बताने की कोशिश की गयी शाहनवाज़ और खुशदीप जी द्वारा. वहीँ एग्रेगेटर की कमी को भी दूर करने की कोशिश पर ध्यान दिलाया गया.
यूँ तो हम सभी एक दूसरे को जानते थे लेकिन जो नए आये थे वो थोड़े संकोच में थे इसलिए कम बोले. हाँ, हितेश एक युवा, जो यात्राओं पर रहता है अक्सर उसका यात्रा पर घुमक्कड़ी डॉट कॉम वेबसाइट है उस पर लिखता है , उसने जरूर थोड़ी बहुत इस बारे में बातचीत की. मगर अभी अभी मेरी बात हुई रमेश सिंह बिष्ट जी से जो कल पहली बार मिले थे तो बोले मैंने आपको पहचाना ही नहीं वर्ना आपके साथ एक अलग से फोटो तो जरूर ही खिंचवाता और आपसे कुछ देर बात भी होती, जिसका उन्हे बहुत अफ़सोस हुआ. कभी कभी संकोच के कारण काफी कुछ छूट जाता है तो आगे से ये ध्यान रखा जाएगा जब सब आ जाएँ तो सबका इंट्रोडक्शन दिया जाए ताकि कोई भी एक दूसरे से अनभिज्ञ न रहे और उसे बाद में कोई अफ़सोस भी न रहे.

गज़ाला जी का घर हो और उनकी मेहमान नवाजी हो तो कौन होगा जो उससे वंचित रहना चाहेगा. सबसे पहले ड्राइंग रूम में बैठे तो वहाँ कोल्ड ड्रिंक और स्नैक्स चलते रहे फिर बाहर लॉन में बैठे तो वहाँ इडली सांभर, समोसे चटनी के साथ, खांडवी, दो तरह की बर्फी और साथ में कोल्ड ड्रिंक और चाय भी .......एक शानदार शाम के लिए महफूज़ और गज़ाला जी का जितना शुक्रिया अदा किया जाए कम ही है . ऐसे आयोजन न केवल संबंधों को प्रगाढ़ करते हैं बल्कि एक नयी दिशा भी देते हैं .

हिंदी ब्लॉगिंग का नया दौर एक बार फिर ब्लॉगर्स की सक्रियता की ओर देख रहा है तो आइये ब्लॉगिंग को उसका नया स्वरुप देकर अपना योगदान दें ताकि जिंदा रहे हिंदी और आपका लेखन ...
#हिन्दी_ब्लॉगिंग
 











 

गुरुवार, 6 जुलाई 2017

चल अकेला

साथ कब किसी का होता है 
सब अकेले ही चलते हैं 
ये तो मन के भरम होते हैं 
वो मेरा है 
वो मेरा अपना है 
वो मेरा प्रियतम है 
जब भीड़ में भी तन्हाई डंसती है 
तब पता लगता है 
किस साथ के भरम में 
उम्र के शहतूत गिर गए 
वो जो चिने थे सदियों ने 
सारे पर्वत पिघल गए 
फिर इक नया सफ़र शुरू होता है 
चल अकेला चल अकेला चल अकेला का सिद्धांत मुखर होता है 

क्योंकि 
अंतिम सत्य तो यही है 
अकेले आगमन होता है 
और अकेले ही गमन 
तो कैसे सम्भव है 
बीच में काफिलों का बनना 
बस इस सबब को समझते समझते 
टूट जाती हैं सारी शाखें वक्त के वृक्ष से 
और उस पल का अकेलापन 
काफी होता है उम्र भर को तोड़ने को 
और दूसरे की थाली से रोटी खाने से कब किसी का पेट भरा है 
जब तक कोई खुद न उस दोज़ख से गुजरा है 
अपने हिस्से के आस्माँ को जिसने खुद ना निरखा है 
कैसे सम्भव है 
रेगिस्तान की रेत से पानी उलीचना ?

खुद के मरे बिना कब स्वर्ग मिला करता है 
आश्वासनों की तहरीरों पर ना जीवन गुजरा करता है 
जब समझ आता है तब तक 
देर की देहरियों पर सांझ उतर आती है 
और रात्रि के अंतिम पड़ाव से पहले 
अकेलेपन के जंगलों में फिर कोई सूरजमुखी नहीं खिला करती 
जानना जरूरी है ............
अकेलेपन की त्रासदी को भोगने से पहले 
जानना जरूरी है …………चल अकेला के सिद्धांत को 

#हिन्दी_ब्लॉगिंग

शनिवार, 1 जुलाई 2017

हम सब जुनैद हैं

मैं मर चुकी हूँ
हाँ , चुक चुकी है
मेरी खोज
मेरी अंतर्वेदना
मेरा मन

नही रही चाह किसी खोजी तत्व की
एक गूंगा मौसम फहरा रहा है
अपना लम्पट आँचल
और मैं हूँ गिरफ्त में

जीने की चाह न बचना
आखिर है क्या ?
मौत ही तो है ये भी
साँस लेना जिंदा होने का सबूत नहीं

राम रोज बरस रहा है धरती पर
कभी बरखा बन कर तो कभी कहर बन कर
मासूमों का क़त्ल
मेरे समय का शून्यकाल है
संवेदनाएं पक्ष विपक्ष कब देखती हैं
शून्य चित्त से नहीं किये जाते आह्वान

समय दरोगा बन कर रहा है शासन
हुक्म उदूली करना पर्याय है विद्रोह का
देश बन गया है कत्लगाह
जुनैद हैं यहाँ सभी
हम सब जुनैद हैं
मारे जा चुके हैं
तो बताओ कैसे कहूँ - जिंदा हूँ मैं ?

मगर "राम" जिंदा हो गया
अपने समय के वीभत्स स्वरुप पर अट्टहास करता हुआ
अल्लाह की सिसकियों से बोझिल है सारी कायनात
जुनैद का मरना जरूरी है शान्ति पाठ के लिए ....

आज मौत मेरा स्वाभाविक अवलंबन है
और विद्रोह मेरा गुनाह ...

#हिंदी_ब्लोगिंग

सोमवार, 26 जून 2017

किस्मत की धनी




चूंकि मैं एक औरत हूँ
नहीं जी पाती मनमाफिक ज़िन्दगी
फिर जी भर के जीना किसे कहते हैं ...नहीं पता

बस उम्र के दौर बदलते रहे
नहीं बदला तो जिम्मेदारियों का शिड्यूल
क्या उमंगों की बारात नहीं निकलती थी मेरे मन की गली से
क्या चाहतों के शामियाने नहीं टंगा करते थे मेरी हसरतों पे
सब था मगर नहीं था हक़
अपनी उमंगों, चाहतों, जज्बातों , हसरतों के गुलदस्तों को सजाने का
'लड़की हो , जो करना हो अपने घर जाकर करना'
'या फिर शादी के बाद करना'
तक सिमटी रही दुनिया
और फिर बदल गयी सभ्यता

नयी सभ्यता के नए साजो सामान
करना था मुझे ही खुद को अभ्यस्त
और निकल गया वक्त मुट्ठी से
और मैं 'अपना घर' ढूँढती रही राख के ढेर में

चाहत थी उडूं पंछी बन आकाश में
कभी अकेले कभी दुकेले
तो कभी सामूहिक
चाहत थी एक बार चूम लूँ चाँद के काफिर पैर
और हसरतों की धवल चांदनी से खिल उठे मन कँवल
चाहत थी भर लूँ साँसों में सारे जहान की खुशबू
जो रोम रोम कर दे सुवासित
चाहत थी कर लूँ दुनिया मुट्ठी में मीत संग
और गा लूँ ज़िन्दगी का गीत प्रीत संग
मगर वक्त के तीतर कब रहम खाते हैं
उम्र तियापांच में ही गुजार जाते हैं
मीत भी कब मन की ड्योढ़ी चढ़ पाते हैं

मेरा औरत होना अक्सर प्रश्नचिन्ह की ड्योढ़ी पर कीला मिला
और जिम्मेदारियों और कर्तव्यों की पोटली से सर मेरा झुका मिला
अच्छी माँ, अच्छी बेटी, अच्छी पत्नी बनते हुए भी
न कभी अच्छी माँ, बेटी या पत्नी का खिताब मिला
मेरे त्याग मेरे समर्पण का बस यही सिला मिला
तुम अनोखी नहीं जो ये करती हो ...

जब शरीर ने भी साथ छोड़ दिया
और तमन्नाओं ने विद्रोह का बिगुल मन में छेड़ दिया
खुद को मिटा दिया तब ये इल्म हुआ
आखिर कब उम्र वापस मुड़ी है
जो अब आस की कोई कड़ी हो और तू जी जाए एक मुकम्मल ज़िन्दगी
चाहतों भरी, उम्मीदों भरी, हसरतों भरी

अब सुलगती चटखती उम्र की लकड़ियाँ
अक्सर बतियाती हैं
जहाँ इश्क का छींटा भी नहीं लगा होता 
वहीँ धोक देने की परंपरा निभाती है
कितनी पारंगत होती है अभिनय में 
जो दिल की ख्वाहिशों को न कभी लब पर लाती है
बस अन्दर ही अन्दर खुद को मिटाती है
और एक बेसबब उम्र जी जाती है

अपनी हसरतों का कफ़न ओढ़ कर 
तमन्नाओं की चिता पर 
अपनी चाहतों की अग्नि से 
करती है खुद का अंतिम संस्कार
कितनी किस्मत की धनी होती है एक औरत
जीने को ज़िन्दगी मिली तो सही
बस यही होती है एक औरत के अंतिम संस्कार की अंतिम रस्म
जहाँ समय का बिजूका गुनगुनाते हुए मरहम यूँ लगाता है 
कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता ....





बुधवार, 21 जून 2017

ज़िन्दगी के कोष्ठक में...

जाने कैसे चलते चलते किसी को कोई यूं ही मिल जाया करता है ...यहाँ तो उम्र के सिरे हाथ से छूटते रहे मगर किसी गुनगुनी धूप का कोई साया भी न पसरा किसी कोने में ...जाने कौन से लोग थे जिन्हें तुम और मैं दो रूपक मिले यहाँ तो सिर्फ उम्र से ही बावस्ता रहे ...कि किरच किरच चटखती है अक्सर रूह की वादियों में और सावन है कि कभी बरसा ही नहीं फिर कैसे और कौन कहे सावन को आने दो ...तुम आ गए हो नूर आ गया है एक कागज़ी ख्याल भर रहा जिस्म का ज़र्रा ज़र्रा सुलगता ही रहा ...ये अकेलेपन के तांबई रंग हैं जो किसी बाज़ार में नहीं चला करते ...तांबे के सिक्कों का चलन तो एक युग बीता बंद हो चुका है फिर क्यों रूह की बतखें कुलबुलाते हुए क्वैक क्वैक करती हैं ...आओ आमीन के साथ बंद करो चैप्टर कि संगसार होने का वक्त है ये जहाँ तुम्हारे अपने सिवा तुमसे कोई नहीं मुखातिब ...विषकन्या का रोल ख़त्म होता है कि वो पैदाइश है तुम्हारी , तुम्हारे सपनो की, तुम्हारे मिटने की ...अब टन टन की आवाज़ से बजता समय का घंटा सूचना है रुखसती की कि यहाँ विदाई की रस्में गाजे बाजे से नहीं निभायी जातीं ...करो विषपान जीवन की निस्सारता का ...और गाओ गीत ...मेरा जीवन कोरा कागज़ कोरा ही रह गया ...लो अंतिम अध्याय सम्पूर्ण हुआ ...मिलेंगे फिर किसी ज़िन्दगी के किसी कोष्ठक में ...तब तक अलविदा ज़िन्दगी

रविवार, 18 जून 2017

आवाज़ - पिता की या बेटी की ?

लाठी पकड़ चलते पिता
कितने अशक्त
एक एक कदम
मानो मनो शिलाओं का बोझ उठाये
कोई ढो रहा हो जीवन/सपने/उमीदें

फिर भी सिर्फ अपनी ममता से हार जाते
खुद को ढ़ोकर
टुक-टुक करते लाठी पकड़
पहुँच ही जाते दूसरे कमरे में टेलीफोन के पास
मोबाइल का ज़माना नहीं था वो
यदि था भी
तो इनकमिंग ही इतनी महँगी थी
कि चाहकर भी
खुद को नहीं दे सकते थे ये उपहार
आखिर पेंशनर जो ठहरे

पिता की ममता
उनका स्नेह
सिमट आता था चंद पंक्तियों में
और हो जाते थे वो संतुष्ट
सुन बेटी की आवाज़
मानो मिली हो उन्हें
सारे जहान की सौगात

कैसी है ?
अच्छी हूँ
आप कैसे हैं ?
मैं भी ठीक हूँ
बच्चे कैसे हैं ?
वो भी ठीक हैं
बस हो गया संवाद सम्पूर्ण
बस मिला गया उन्हें अनिर्वचनीय सुख
बस हो गयी तसल्ली
बेटी सुखी है
सुन ली उसकी आवाज़

तो क्या हुआ
जो कुछ कदम चल
खुद को तकलीफ दे दे
आवाज की आवाज़ से मुलाक़ात तो हो गयी
ब्याह दी जाती हैं जिन घरों से बेटियां
अकेलेपन की लाठी बहुत भारी होती है
तोड़ने को उस लाठी की चुप्पी
पिता, टुक-टुक कर पहुँच सकते थे कहीं भी

बेटियां, पिता की दुलारी बेटियां
पिता को खोने के बाद याद करती हैं
देती हैं आवाज़
एक बार आओ
करो फिर से संवाद
उसी तरह ... बाउजी
कि आवाज़ ही माध्यम है तसल्ली की
कुशलता की
की हो वहाँ सकुशल आप

इस बार फर्क सिर्फ इतना है
पिता की जगह बेटी ने ले ली है...

सोमवार, 5 जून 2017

महज - सिफर

एकतरफा खेल है ज़िन्दगी
तुम ही चाहो तुम ही पुचकारों
उस तरफ कोई नहीं तुम्हें चाहने वाला
फिर वो खुदा हो या संसार

उठाये थे कुछ मोहरे
चली थीं कुछ चालें
कभी सीधी कभी तिरछी
हर चाल पे शह और मात

अब
न खुदा की खुदाई है
न ज़िन्दगी की रुसवाई है

घूँघट की ओट से झाँक रही है मेरे मन की कुँवारी दुल्हन
जिस गली में तेरा घर न हो
उसी गली से अब तो गुजरना हमें

आस विश्वास परिहास महज एक शब्दकोष ज़िन्दगी का
और पढने पर महज - सिफर

गुरुवार, 1 जून 2017

ये मेरा इश्क था

देखा है कभी भटकी हुई रूह का मातम
दीवानगी की दुछत्ती पर
जर्रा जर्रा घायल मगर नृत्यरत रहा
एक तेरे लिए
और तू बेखबर

अब कौन गाये सुहाग गीत
बेवाओं के मातम हैं ये
और तुम खुश रहे अपनी मुस्कुराहटों में
ऐसे में
उम्मीद का आखिरी गज़र भी तोड़ दिया

अब सोखने को गंगा जरूरत नहीं किसी जन्हु की
ये मेरा इश्क था
जो मुस्कुराहटें गिरवीं रख ख़रीदा था मैंने

फिरअलविदा कहने  की रस्म का भला क्या औचित्य ?

मंगलवार, 16 मई 2017

द्वन्द जारी है

मन एक जंगली हाथी सा
कुचल रहा है
सुकून के अभ्यारण्य में विचरती
ख़ामोशी के फूलों को

बेजा जाता जीवन
अक्सर तोलने लगता है
प्राप्तियों को
सत्य के बाटों से
तो सिवाय थोथे जीवन के
कोई सिरा न हाथ लगता है 
 
खुद से उठता विश्वास ... सत्य है 
स्वीकारना ही पड़ेगा 
कि 
चुक ही जाता है इंसान एक दिन 
और जीवन भी

द्वन्द जारी है
द्वन्द जारी रहेगा
जीवनछंद के अलंकार बद्ध होने तक ...


गुरुवार, 4 मई 2017

कॉपी राईट

हम इंतज़ार करेंगे
साथी
हम इंतज़ार करेंगे
इंतज़ार पर हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है
कह, नहीं सिद्ध किया जा सकता कुछ भी
हाँ , कह सकें गर
इंतज़ार पर हमारा कॉपी राईट है
तो वजन बढ़ता है
एक तीर से कई शिकार करता है

इंतज़ार
एक छोटा सा शब्द
लेकिन व्यापक अर्थ
और खुद में समायी एक मुकम्मल अभिव्यंजना
तो कैसे शब्द को शब्द भर रहने दें
क्यों न उसकी मुकम्म्लता साबित कर दें

इंतज़ार क्या है
बस इतना ही
कभी किसान देखता है आसमान की तरफ
बरखा की आस में
तो कभी देखता है तो कहता है
न, मत बरसना
सोना मिटटी हो जायेगा
मेरे देश की जनता भूखों मर जायेगी
तो क्या हुआ
गर इतनी भर है इंतज़ार की परिभाषा

न , न  ये भी नहीं
इंतज़ार का पलीता तो
जनता भाग्य में लिखाकर आती है
तभी तो बेखबरी की नींद सो जाती है
वो जगाते हैं पाँच साल बाद
तो फिर एक बार
उन्हें आश्वासन दे आती है
फिर चाहे खुद के भाग्य न छींका टूटे
मगर अपने इंतज़ार को
मुकम्मल न कर पाती है
बस यहीं तक अपनी उपस्थिति दर्ज कराती है

आज नहीं करता कोई किसी का इंतज़ार
इसलिए जनाब
एक तबके ने कर लिया दावा कॉपी राईट का
अब प्रेम में असफल नहीं होते
अब मोहब्बत के इन्जार में बूढ़े नहीं होते
गए वो दिन
जब राम के इंतज़ार में अहिल्या पत्थर हो जाया करती थी

आज इंतज़ार का अर्थ
राम मंदिर नहीं है
बाबरी मस्जिद है
बुरका है , तलाक है
और संवेदनाओं का अंत है
सीमा पर शहीदों का बहता रक्त है
जहाँ नहीं की जातीं सर्जिकल स्ट्राइक तब तक
जब तक न उससे खुद का भला हो


तो जनाब
इंतज़ार पर उनका कॉपी राईट हुआ न
जहाँ चाहे जिसपर चाहे थोप दिया
सहूलियतों के चमचों पर नहीं बनाई जाती अब इमारतें
एक खटराग जरूरी है छद्मवेश धारियों के लिए
कि
मौसम भी जुबाँ बदलता है ...

चलो इंतज़ार के सब्जबागों में थोड़ी देर टहल आयें
बस यहीं तक है
भाग्यवादियों की पैमाइश

आज कॉपी राईट के ज़माने में इंतज़ार महज बैसाखी ही तो है

शनिवार, 22 अप्रैल 2017

मंजिल की तलाश में

मंजिल की तलाश में
बहुत दूर निकल आये हम
वो कहते हैं रास्ता बदल दो
वो कहते हैं मंजिल 


अब मुझे खुद से शिकायत है
सोचता हूँ
खुदा बदल दूँ


कि
बुतपरस्ती मेरा शौक है यारा ....

शुक्रवार, 14 अप्रैल 2017

बिन्नी चौधरी की नज़र में -- "बुरी औरत हूँ मैं"




"बुरी औरत हूँ मैं" की Binni Chaudhary द्वारा लिखित प्रतिक्रिया ....कम शब्दों में गागर में सागर भरती प्रतिक्रिया के लिए दिल से आभार बिन्नी........तुम सबकी प्रतिक्रिया ही मेरे लेखन का सबसे बड़ा प्रतिफल है जो मुझे आगे लिखने को प्रेरित करता है :)

प्रतिक्रिया इस प्रकार है : 

वंदना गुप्ता द्वारा लिखा गया कहानी संग्रह "बुरी औरत हूँ मैं"... कहानियों का संग्रह नहीं फूलों का गुलदस्ता है। जिसमें भिन्न -भिन्न रंगों और खुशबुओं के फूल हैं। आपकी कहानियों में सबसे अच्छी बात यह है कि जब तक कहानी समाप्त नहीं होती यह दिलचस्पी बनी रहती हैं कि आगे क्या होगा? इस पुस्तक में तो आपने कहानी के साथ कविता का भी रस घोला है... जिससे मिठास और भी बढ़ गई हैं। कुछ कहानियां.. जैसे ऐसा आखिर कब तक?...छोटी सी भूल या गुनाह, बुरी औरत हूँ मैं, कितने नादाँ थे हम, आत्महत्या :कितने कारण आदि बार -बार पढने को मन करता हैं..! ये कहानियाँ कुछ सोचने को मजबूर करती हैं..! दिल और दिमाग कहानी के पात्र और घटनाओं पर तर्क -वितर्क करने को विवश करता है..! पता नहीं आपकी ये कहानियाँ वास्तविक जिंदगी से प्रेरित है या नहीं लेकिन मैं ये यकीन से कह सकती हूं कि आपकी ये कहानियाँ हमारे समाजिक परिवेश में प्रायः देखने को मिलता है..! जिसे आपने अपने कलम के जादू से बड़ा प्रभावी बना दिया हैं.....! वंदना गुप्ता दी......!

बुधवार, 12 अप्रैल 2017

धुँधले अतीत की आहटें



"धुँधले अतीत की आहटें" गोपाल माथुर जी द्वारा लिखित उपन्यास बोधि प्रकाशन से छपा है जिसे गोपाल माथुर जी ने बहुत ही स्नेह के साथ मुझे भेजा . गोपाल माथुर जी की लेखनी को मैंने पहले भी पढ़ चुकी हूँ तो उनकी लेखनी की तो हमेशा से ही कायल हूँ .

 जब इस उपन्यास को पढ़ा तो लगा लेखक खुद में एक पूरी यूनिवर्सिटी हैं .उपन्यास लेखन वैसे भी कोई आसान कार्य नहीं होता . एक लगन निष्ठा , एकाग्रता और निरंतरता की मांग करता है जिसका अहसास उपन्यास पढ़ते समय होता है . उपन्यास पढ़ते हुए लगता है जैसे इस उपन्यास के बारे में दो लफ़्ज़ों में नहीं कहा जा सकता। एक यात्रा है ये लेखक की जहाँ वो अनुपस्थित होते हुए भी उपस्थित है जो पाठक के मन  से मानो संवाद कर रहा हो, उसे झकझोर रहा हो । पाठक मन चकित विस्मित सा कथा के प्रवाह में बहता जाता है। ये सच है उपन्यास लेखन एक यात्रा से कम नहीं और यहाँ भी पढ़कर ऐसा ही लगता है जैसे लेखक ने ये उपन्यास कोई साल छह महीने में नहीं लिखा हो बल्कि एक लम्बा अरसा उन लम्हों को जीया हो और फिर उन्हें एक सूत्र में पिरोया हो . मानो कोई रोज डायरी लिख रहा हो . रोज की दिनचर्या में पल प्रतिपल बदलते जीवन के पहलू और उनसे उपजी पीड़ा , हताशा तो इंसान सहता ही है मगर रिश्तों की तल्खियों से ऊबकर जब जीना पड़ता है तब अपने विगत से छूट नहीं पाता वो आज में भी साथ साथ चलता है . यूँ कहानी में मुख्य पात्र दो ही हैं सिंथिया और लेखक, जो इस कहानी को कह रहा है या कहिये सोच रहा है या फिर जी रहा है . मगर दो पात्र अनुपस्थित होते हुए भी हर पल उपस्थित हैं फिलिप और संजना. फिलिप सिंथिया का पति और संजना लेखक के साथ रहने वाली लिव इन पार्टनर . इस अनुपस्थिति में उपस्थिति को दर्शाना बेशक आसान हो मगर उस उपस्थिति का अहसास हर पल बनाए रखना आसान नहीं होता लेकिन लेखक ने ऐसा किया है . लेखक ने मानो एक जीवन को जीकर इस उपन्यास को लिखा है . पाठक उपन्यास जैसे जैसे पढता जाएगा पात्र उसके साथ साथ चलते जायेंगे और ऐसे उसके साथ शामिल हो जायेंगे कि वो पात्रों के नाम तक भूल जाएगा क्योंकि ऐसा ही मेरे साथ हुआ है अब जब इसके बारे में लिखने बैठी हूँ तो ख्याल आया कि स्त्री पात्र का तो नाम यहाँ वर्णित है मगर शायद पुरुष पात्र को कोई नाम नहीं दिया लेखक ने , जहाँ तक मुझे याद है . या हो सकता है उसका कोई नाम हो और एक आध जगह आया हो तो पात्र के नाम की जरूरत ही महसूस नहीं हुई शायद इसीलिए ध्यान से निकल गया हो . शायद यही होता है लेखन का कमाल जहाँ स्त्री और पुरुष भर दो पात्र रह जाएँ बाकी सब गौण हो जाए .

मूल बात इस उपन्यास को तीन हिस्सों में बाँटा है लेखक ने और हर हिस्से से पहले एक कविता वर्णित है जो उस भाग में क्या लिखा है मानो उसका दर्पण है . वहीं इस कहानी का मुख्या पात्र यानि पुरुष भी एक लेखक है जो खुद भी एक उपन्यास लिख रहा है यानि कहानी के साथ साथ उसके उपन्यास लेखन की यात्रा का भी लेखक ने बखूबी वर्णन किया है मानो कहना चाहता हो किन किन मोड़ों से गुजरते हुए एक उपन्यास आकार पाता है , किन जद्दोजहद से लेखक गुजरता है फिर वो आन्तरिक हों या मानसिक और पाठक एक क्षण में उसे स्वीकार या अस्वीकार कर देते हैं .

कहानी कोई कहे तो दो लफ़्ज़ों में कह दे लेकिन कहानी को ठहराव के साथ , महसूस करते और कराते हुए कहना हो तो लेखक से सीखे जहाँ दोनों पात्रों की अपनी अपनी ज़िन्दगी में एक अतीत है जिसे दोनों छोड़ चुके हैं मगर भुला नहीं पाते , गाहे बगाहे अतीत उनकी स्मृतियों में जिंदा रहता है , अपनी उपस्थिति का आभास कराता रहता है . वहीँ सिंथिया और उसका बेटा पिन्टो दोनों तक ही सिमटी है उनकी ज़िन्दगी लेकिन फिलिप की अनुपस्थिति में उपस्थिति से व्याप्त पीड़ा का दंश सिंथिया हर पल जीती है , जिसमे अन्दर आने की किसी को इजाज़त नहीं. उस दर्द को जीते हुए किन किन मोड़ों से एक स्त्री गुजरती है, कितनी अकेली वो होती है , कैसे कोई प्रतिकार उसके पास होता ही नहीं , एक एक लम्हे का जैसे आँखों देखा हाल किसी ने वर्णन किया हो , कुछ ऐसे लेखक ने पल पल को जीवंत किया है कि एक एक घटनाचक्र आँखों के आगे घटता हुआ दिखाई देता है . सिंथिया जैसी स्त्री जो कम बोलती है , उसकी अपनी एक दुनिया है जिसमे किसी का प्रवेश नहीं . वो साथ बैठी है मगर अपनी दुनिया में खो जाती है, एक उदासी हर पल उसे अपने घेरे में कैद करे रखती है जो लेखक को कचोटती है लेकिन वो उसके एकांत में दखल नहीं देता. उसे अपनी सीमा मालूम है. एक रहस्य मानो दस्तक देता हो और उधर के सब दरवाज़े तिलिस्मी हों जो खुलेंगे तो सिर्फ सिंथिया की इच्छा पर ही .

सबसे बड़ी बात उपन्यास जिस मद्धम गति से चलता है लगता है इतनी ही मद्धम गति से लिखा गया और पढ़ा भी वैसे ही जाता है मानो कोई स्वाद के चटखारे ले लेकर भोजन का आनंद ले रहा हो . इस उपन्यास के बारे में जितना लिखा जाएगा कम ही रहेगा और यदि किसी को एक यात्रा का आनंद लेना हो, पात्रों के संग उसे जीना हो तो ये उपन्यास खुद पढना होगा और पढ़ते हुए उसे जीना होगा . यूँ दो चार पात्र कहानी में आते जाते हैं मगर मुख्य दो पात्र ही इस उपन्यास का दिल धड़कन आत्मा और शरीर सब हैं . जहाँ कोई रिश्ता नहीं होकर भी दुःख का रिश्ता स्वतः बन जाता है . शायद इसीलिए कहा गया हो खगही जाने खगही की भाषा. फिर भी लगता है जैसे जब तक खुद उस हालात से न गुजरो आप नहीं समझ सकते दूसरे की तकलीफ दर्द और पीड़ा को . पीड़ा जो अपने रसायन से बाहर ही नहीं आने देती सिंथिया को और जो संभव ही नहीं था . सिंथिया एक रहस्यमयी पात्र के रूप में आती है लेकिन जब अंत पढो और उस रहस्य से पर्दा हटता है तो लगता है जैसे सब कुछ छिन गया हो और प्रश्न उठे आखिर ऐसा क्यों?

उपन्यास के अंत ने तो मानो इस यात्रा को यानि पाठक की यात्रा को जैसे डेड एन्ड पर लेजाकर खड़ा कर दिया और मानो खुद से पूछ रहा हो ऐसा आखिर क्यों। ब्रैस्ट कैंसर की भयावह त्रासदी को लेखक  जिस तरह उकेरा है शायद ही कोई लिख पाया हो। एक सच का एक जीवन की जटिलता का कैसे सामना करना होता है बल्कि कहा जाये खुद का खुद से सामना करना क्या इतना आसान होता है खासतौर से तब जब एक स्त्री का न केवल बाह्य सौंदर्य बल्कि आंतरिक सौंदर्य भी प्रभावित हो रहा हो। उस जद्दोजहद उस कश्मकश को कहना आसान  नहीं . एक स्त्री जो इस पीड़ा से गुजरती है उसके दर्द को , उसकी निराशा हताशा को , उसके जीवन की नीरसता को कैसे कलमबद्ध किया जाए शायद लेखक से बेहतर कोई वर्णित नहीं कर सकता . हर पल आप सिर्फ कयास लगाते रहेंगे उसकी उदासी का , उसके अकेलेपन का कि शायद कोई भी वो कारण हो जैसा अक्सर होता है लेकिन जैसे ही अंत आपके सामने आएगा आप न केवल चौंक उठेंगे बल्कि पूरी कहानी और सिंथिया की पीड़ा क्षण भर में एक चलचित्र की भांति आपके सामने होगी और आप भी उसके दर्द से कराह उठेंगे शायद तब समझ पायें एक कैंसर पीडिता का दर्द, उसकी विवशता जहाँ उसे जीना भी अभिशाप सा लगता है सिर्फ मातृत्व ही उसे जीने की वजह देता है . उस पर दोनों वक्षस्थल गँवा देना और उसकी वजह से फिलिप का उसे छोड़ दूसरी के साथ रहना , शायद काफी है एक जीवन को अभिशापित करने के लिए , उससे उसका वजूद छीनने के लिए , जीवन भर के लिए दुःख के गर्त में धकेलने के लिए और ऐसा ही सिंथिया के साथ यहाँ होता है बस जो एक पक्ष में बात होती है वो ये कि उसके पास उसका एक बच्चा है जो उसे जीने को वजह देता है वर्ना यदि वो भी न होता तो ? तब शायद वो कभी इस पीड़ा से बाहर ही नहीं आ पाती, जीने की कोई वजह ही नहीं ढूंढ पाती. बेशक बीमारी में उसका दोष नहीं लेकिन अंग भंग होने पर भी जीना ही पड़ता है बस जरूरी है एक वजह तभी नए सिरे से ज़िन्दगी शुरू की जा सकती है . ब्रेस्ट कैंसर की भयावहता का दूसरा नाम है सिंथिया , जहाँ कैंसर के दर्द से भी गहरे दर्द में वो जी रही है या कहा जाए सिंथिया के माध्यम से लेखक ने ब्रैस्ट कैंसर की उस भयावहता का दर्शन कराया है जो उससे निजात पाने पर उपजती है . बेशक समय समय पर ब्रैस्ट कैंसर पर कभी अनामिका जी और पवन करण जी ने कवितायें लिखीं लेकिन शायद वो सिर्फ कविताओं तक ही सिमित रहे उसकी भयावहता को महसूस न कर सके यदि करते तो शायद कविता का रूप कुछ अलग ही होता . बेशक मैंने भी एक कविता लिखी थी कभी इसी पर "देखा है कभी राख को घुन लगते हुए" . वहां मैंने भी एक युवती जो अभी माँ भी नहीं बनी और ब्रैस्ट कैंसर की शिकार हो जाए और उसके दोनों वक्षस्थल यदि निकल जाएँ तो कैसा मह्सूसेगी जब जब अपने उस अंग को देखेगी , उसका दिग्दर्शन कराया है और यहाँ ये पढ़कर लगा जैसे मेरी उस कविता को , उस स्त्री के दर्द को लेखक ने समझा है और उपन्यास का रूप दिया है जहाँ एक जगह ऐसी आती है कि सिंथिया कहती है यदि पिन्टो न होता तो शायद वो अपना जीवन ही ख़त्म कर लेती और यही बात मैंने उस कविता में कही थी कि कैसा लगता होगा एक स्त्री को जब वो मातृत्व के सुख से वंचित हो जाती होगी शायद तब खुद को किन्ही कमजोर पलों में ख़त्म करने की भी सोच लेती होगी . वही मुझे यहाँ मिला . शायद यही इस बिमारी की भयावहता का सबसे दर्दनाक पहलू है जहाँ वो एक सफल जीवन नहीं जी पाती . ऐसे में जरूरी होता है एक पुरुष का साथ लेकिन हजारों में कुछ ही होंगे जो साथ देते होंगे नहीं तो जाने कितनी इस त्रासदी को भोगती होंगी . ये पढ़कर लगा जैसे मेरी कविता को आज सार्थकता मिल गयी या कहूँ इस संसार में कहीं न कहीं वो घटित होता है जो लिखा जाता है फिर पता चाहे बाद में चले ........ऐसा लगा जैसे उस कविता के पात्रों को लेखक ने जिवंत कर दिया हो और मेरा लिखना सफल हो गया हो . ये उपन्यास मानो उस कविता का आईना हो .

वहीँ एक ख्याल उभरता है कि स्त्री यदि शारीरिक रूप से अक्षम हो जाए तो पुरुष को पल नहीं लगता उसे छोड़ दूसरा जहान बसाने में लेकिन वहीँ ऐसा यदि पुरुष के साथ हो तो वो ताउम्र उसकी लाचारगी और विवशता के साथ जी लेती है . और यहाँ तो शारीरिक रूप से अक्षम भी नहीं है बल्कि बीमारी की त्रासदी से ग्रसित है लेकिन मानो स्त्री सिर्फ यौनांगों के कारण ही पूर्ण है अन्यथा पुरुष की नज़र में उसकी कोई कीमत नहीं . नहीं मिलता उसे पुरुष साथी का साथ . लगता है जैसे स्त्री सिर्फ यौनिकता को पूर्णता देने वाला पात्र भर है उससे इतर उसकी कोई पहचान नहीं और शायद यही दंश है जो सिंथिया को घुन की तरह खाता रहता है , अपनी अपूर्णता का हर पल अहसास कराये रखता है वहीँ फिलिप का इंतज़ार उसके प्रेम की पराकाष्ठा है . एक स्त्री किस हद तक किसी को चाह सकती है , किसी के लिए जी सकती है मानो एक एक पल को लेखक ने खुद देखा हो और कलमबद्ध किया हो, पाठक को ऐसा लगता है . इतनी बारीकी से स्त्री मन की पीड़ा को कह पाना आसान नहीं खासतौर से जब स्त्री पात्र की चुप्पी ने सब राहें बंद कर रखी हों. लेकिन उसकी चुप्पी भी मुखर है जरूरत है तो उसे देखने और समझने वाली नज़र की और ऐसा ही यहाँ हुआ जब उपन्यास का पुरुष किरदार उर्फ़ लेखक ने उसे देखा और समझना चाहा . यहाँ गोपाल माथुर जी ने लेखक मन कैसा सूक्ष्म होना चाहिए कि सामने वाले की आँखें , भाव भंगिमा देख ही जान ले उसके अन्दर की हलचल को , तूफ़ान को , निराशा को , का लेखक के माध्यम से वर्णन किया है .

वहीँ साथ साथ लेखक ने पुरुष पात्र और संजना के मध्य लिव इन रिलेशन से उपजे अलगाव को भी दृष्टिगोचर किया है जहाँ सम्बन्ध यथार्थ के धरातल पर बहुत खोखले होते हैं फिर उनका शिकार स्त्री हो या पुरुष क्योंकि ज्यादातर लिव इन संबंधों में स्त्रियाँ ही पुरुषों की बेवफाई या दुत्कार की शिकार होती हैं यहाँ पुरुष पात्र को शिकार दर्शाया गया है . वहीँ समुद्र , बारिश , मौसम का साथ साथ चलना मानो कहानी को और मुखर करता है और सच्चाई के करीब जैसे लेखक खुद उस माहौल में एक अरसा रहा हो और फिर एक एक दृश्य को जिवंत कर रहा हो . सम्बन्ध कोई हो आहत दोनों ही होते हैं या कहिये जो ज्यादा संवेदनशील होगा वो ज्यादा आहत होगा फिर वो पुरुष हो या स्त्री या जो ज्यादा जुड़ा होगा . यहाँ पुरुष पात्र की व्यथा को उकेरने में कोई कमी नहीं उसी शिद्दत से उकेरा है जैसे स्त्री पात्र की पीड़ा को .

वहीँ कहानी में वृद्ध पुरुष जो सिंथिया के ससुर हैं जिसने लेखक दरवाज़ा बनवाने जाता है उनकी कहानी भी साथ साथ चलती है . वहां के दृश्यों को , भाषा की अनभिज्ञता होने के बाद भी संवेदनाओं से संवाद कैसे किया जाता है मानो लेखक ने वो बता दिया , दिखा दिया , मानो कहना चाहता हो जब भाषा नहीं थी तब भी तो संवाद होता था तो अब कैसे संभव नहीं . वहीँ उनकी कहानी को भी उनकी मृत्यु पर लाकर अंतिम रूप तो दिया ही साथ ही उनकी मृत्यु होने पर उनके बेटे फिलिप का न आना मानो सिंथिया को अहसास करा गया जो पंछी एक बार उड़ जाते हैं वो डाल पर वापस नहीं लौटते और वो स्वयं के लिए निर्णय ले सकी . वहीँ  पिन्टो जो शुरू में लेखक को पसंद नहीं करता , उसकी बीमारी के बाद धीरे धीरे पसंद करने लगता है , सबको साथ लेकर लेखक चलते हैं और हर कहानी को अंतिम रूप देते हैं जो उनके कहाँ का कौशल है जिसमे कहीं कोई विखंडन नहीं , समरसता बराबर बनी रहती है .


अब यदि लेखक के लेखन में प्रयुक्त भाषा बिम्ब और शैली की बात की जाए तो उसके लिए तो शब्द भी थोड़े पड़ जायेंगे. पाठक पल पल चकित होता जाएगा जैसे जैसे कहानी पढता जाएगा एक से बढ़कर एक शब्द संरचना जो हर पेज को नायाब  बनाती है जैसे किसी जौहरी ने नगीने जड़े हों और हार की सुन्दरता को द्विगुणित कर दिया हो . कहते हैं निर्मल वर्मा ऐसा लेखन किया करते थे मैंने उनकी सिर्फ एक किताब में कुछ कहानियाँ पढ़ी थीं तो सच पूछा जाए मुझे उनके लेखन से भी आगे का लेखन लगता है गोपाल माथुर जी का लेखन जो अपने साथ पाठक को बहा ले चलता है . यदि उस सुन्दरता का दर्शन करना है तो ये कुछ टुकड़े लगा रही हूँ मगर सम्पूर्ण आनंद लेना है लेखन का तो किताब खुद पढनी पड़ेगी . एक ऐसा लेखन जहाँ पात्र यानि चेतन ही नहीं जड़ भी बोलने लगें अर्थात जड़ से भी संवाद कराने की कला में माहिर हैं लेखक फिर वो समुद्र हो , बारिश , सड़क, बैंच या लैंप ..........सब पात्र हैं कहानी के .

१) वे सावधानी से बैठी हुई थीं, की कहीं असावधानीवश कोई स्पर्श हमारे बीच मेहमान बन कर न चला आये . न तो मैं उन्हें देख सकता था और न ही सुन सकता था सिर्फ महसूस कर सकता था, उनके भार विहीन भार को...एक ऐसा भार, जिसके नीचे दब कर मेरे सारे अनुभव अनुभव हीन होकर रह गए थे .

२)हमारे दोनों और लगे नारियल और कटहल के घने वृक्ष हमें गुजरते हुए देख रहे थे. पता नहीं उन पेड़ों ने क्या सोचा होगा? शायद उन्होंने सोचा हो कि ये दोनों कौन हैं जो इस तरह एक दुसरे से अपरिचित उस पतली सी पगडण्डी पर पाँव रखते हुए चले जा रहे हैं . शायद यह भी सोचा हो कि इन दोनों से तो हम ही अच्छे हैं जो हवा पत्तों डालियों फलों चिड़ियाओं आकाश और तारों से बातें तो करते हैं और एक ये दोनों हैं जो भाषा होते हुए भी चुप हैं .

३)जब कभी हवा चलने लगती तो लगता जैसे कोई परिंदों के बच्चों को लोरी सुना रहा हो

४)न जाने कितना समय निकल गया है शामों के साथ वक्त बिताये..

५)शुरू शुरू में मुझे लगता था कि उपन्यास की सारी स्थितियां मेरी ही तो सृजित की हुई हैं उन्हें मैं कभी भी किसी भी तरह घुमा सकता हूँ पर अहिस्ता अहिस्ता मैंने जाना कि एक सीमा के बाद उपन्यास के पात्र इतना ग्रो कर जाते हैं की लेखक का साथ छोड़ देते हैं और अपनी राह खुद-ब-खुद चलने लगते हैं . एक दिन वे इतने सक्षम हो जाते हैं की लेखक को वह लिखना पड़ता है जो वे चाहते हैं .

५)हम उसी पगडण्डी की और बढ़ गए जो बारिशों में नहा नहा कर बीमार पड़ चुकी थी

६)कई बार जब कोई संदेह अपनी थोड़ी सी झलक दिखाकर छिप जाता है तब हम उस संदेह के इर गिर्द घुमते रहे हैं . संदेह की गांठें सुलझें न सुलझें हम जरूर उलझ जाते हैं .

७)अँधेरे और उजाले से बना एक धुंधलका सा था जिसमे यह अनुमान लगाना कठिन था कि उजाला अँधेरे को खिसका कर वहां आया था या अँधेरा उजाले को

८)किसी की आवाज़ सुनने के लिए किसी रौशनी का मोहताज नहीं होना पड़ता . वह अँधेरा हो या उजाला , अपने लिए कान ढूंढ ही लेती है

९)मुझे लगता था जैसे एक अकेला मैं ही नहीं हूँ जो अपने अतीत के किनारे सर पताका करता हूँ , यह समुद्र भी है ठीक मेरी तरह जो न जाने किस वेदना का मारा सदियों से ठीक मेरी तरह पछाड़ें खा रहा है .

१०)दिन चुपचाप कट रहे थे. घटनाएं अपना घटना भूलकर कैलेंडर की तारीखों के पीछे जा छिपी थीं .

११)मुझे लगा जैसे वह निगाह एक पूरी किताब हो, आद्योपांत पढ़ी हुई , आद्योपांत सुनी हुई, आद्योपांत महसूस की हुई . वह निगाह शब्दों से परे थी, वह रुक गयी थी जैसे कोई शाम हो , जो ठहर गयी थी पेड़ की सबसे ऊंची डालियों पर ... जैसे कोई सदा हो जो सिर्फ मेरे लिए थी, जैसे कोई स्मृति हो जो मेरी अमूल्य धरोहर थी .

१२)अपनेपन की भी एक गंध होती है जिसे सूंघने के लिए नासछिद्रों की आवश्यकता नहीं होती .

१३)हम मुख्य्हाल के बीचों बीच रुके हुए थे जैसे कोई किताब पढ़ते पढ़ते हम बीच में कहीं ठिठक जाते हैं जहाँ पिछले पन्ने हमारा हाथ पकडे रहते हैं और आने वाले पृष्ठ अपरिचित यात्रियों की तरह किसी ट्रेन से उतरने के लिए आतुर नजर आते हैं .......


एक से बढ़कर एक वाक्य संरचना ऐसे ही बनाने से नहीं बनती उसके लिए उन लम्हों को , उन पात्रों को आत्मसात करना पड़ता है तब जाकर अन्दर से वो बाहर आता है जो उन पात्रों का वास्तविक जीवन , सोच , डर , पीड़ा होता है . अब यदि लिखने बैठूँ तो ऐसा लेखन पूरे उपन्यास में है जो साथ साथ चलता है जबरदस्ती थोपा हुआ नहीं है बल्कि उपन्यास का हिस्सा हैं , वो भी संवाद कर रहे हैं , इस तरह तो पूरा उपन्यास ही लिखना पड़े . लेखक के लेखन कौशल की जितनी तारीफ की जाए कम है .

खुद को बीतते बसंत की पदचापों कह मुझे भेंट किया गया उपन्यास लेकिन मैं कहती हूँ आपके लेखन पर हमेशा बसंत छाया रहे . आने वाले हर बसंत में हमें आपसे आपके लेखन के माध्यम से ऐसी ही कृतियाँ मिलती रहें जो हमारे पाठक मन को संतुष्ट कर सकें और सोचने पर विवश भी साथ ही सीखने को भी मिलता रहे . अनेकानेक शुभकामनाओं के साथ ........

मंगलवार, 21 मार्च 2017

रचनी हैं अब साजिशें

रचनी हैं अब साजिशें
स्वप्न तो बहुत देख दिखा चुके
ये वक्त का बदला लहजा है
जिस पर इंसानियत तलवों का उपालम्भ है
और साजिश एक आदतन शिकारी

चौतरफा बहती बयार में
जरूरी है बह जाना
जिंदा रहना जरूरत जो ठहरी आज की
हकीकतों के चिंघाड़ते जंगल
दे रहे हैं दलीलें
वक्त अपनी नब्ज़ बदल चुका है
तुम कब बदलोगे ?

आदर्शों उसूलों के धराशायी होते महल
कबीलों में बदलते जल जंगल और जमीन
ऊँची दुकान फीके पकवान समान
अब नहीं करते जिरह ...
हकीकतें दुरूह हुआ करती हैं
जानते हैं वो ....

सीख सको तो सीख लेना
स्वप्नों से बगावत करना
और साजिशों से दोस्ती करना
कि
ये समय की सबसे बड़ी साजिश है
कोई अठखेली नहीं ...
बदलाव के कबूतरों ने मुंडेरों पर उतरना छोड़ दिया है

साजिशें स्वप्नों का हिस्सा हों
या स्वप्न साजिश का
हलाक तुम्हें ही होना है अंततः ...
कहो अब किस ओर का साक्षी है तुम्हारा जमीर ?


क्योंकि
हर मुस्कराहट का अर्थ अलग हुआ करता है .........जानते हो न